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एक फ़ुरसत अलबेली की लता प्रियतमा, अनामिका जी को अलबेली की गणगौर
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इससे पहले कि इस सदी की किताब बंद हो ऐसा कुछ करें कि हमारे हिस्से के सफ़े कोरे ही न छूट जाएँ !! ......... ........ ( कात्यायनी)
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आँगन बैठ कर गाए जाने वाले गीत, देहरी पर बैठ कर लिखे जाने वाली कविता से कितने अलग थे... (कभी-कभी कलम किसी ख़याल से लिपटकर डूब जाती है)
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