हे ए॰सी॰ के आविष्कारकर्ता, तुमको कोटिश: प्रणाम !
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इससे पहले कि इस सदी की किताब बंद हो ऐसा कुछ करें कि हमारे हिस्से के सफ़े कोरे ही न छूट जाएँ !! ......... ........ ( कात्यायनी)
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एक फ़ुरसत अलबेली की लता प्रियतमा, अनामिका जी को अलबेली की गणगौर
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उदासियों पर नहीं चढ़ते रंग, डुबोती ही जाती है बेचैनी-सी कोई। उसने बात ही बात में एक बात कही और बिलकुल ठीक कही- ‘दुःख हमारी दुनिया बदलते हैं’

